महोबा में होली कभी केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारे और सांस्कृतिक उल्लास का प्रतीक हुआ करती थी। बुजुर्गों की मानें तो एक समय ऐसा था जब होली पर टेसू (पलाश) के फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते थे। इन फूलों को उबालकर निकाले गए गाढ़े केसरिया रंग से लोग एक-दूसरे को रंगते थे, जिससे न केवल त्वचा सुरक्षित रहती थी, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान भी झलकता था।
पुराने समय की होली में गांव-गांव फाग गाने की परंपरा खास आकर्षण होती थी। ढोलक और मंजीरे की थाप पर लोग पारंपरिक फाग गाते, होली के गीतों से माहौल गूंज उठता और पूरा गांव उत्सव में डूब जाता। महिलाएं और पुरुष अलग-अलग टोली बनाकर एक-दूसरे के यहां जाते और गीत-संगीत के साथ रंगों का आनंद लेते थे।
मुहल्लों और गलियों को कागज की रंग-बिरंगी झालरों से सजाया जाता था। बच्चे कई दिन पहले से ही सजावट की तैयारियों में जुट जाते थे। हर घर के बाहर रंगोली, अबीर-गुलाल और पकवानों की खुशबू त्योहार को और भी खास बना देती थी। उस दौर में होली केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक मेल-मिलाप और रिश्तों को मजबूत करने का अवसर भी होती थी।
बुजुर्ग बताते हैं कि उस समय कृत्रिम रंगों की जगह प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था, जिससे स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होता था। आज के समय में जहां होली का स्वरूप बदलता जा रहा है, वहीं महोबा की पुरानी होली की यादें लोगों के दिलों में अब भी जिंदा हैं।
Holi 2026 के अवसर पर इन परंपराओं को याद करते हुए स्थानीय लोग मानते हैं कि यदि फिर से टेसू के फूलों के रंग और फाग की परंपरा को अपनाया जाए, तो त्योहार की असली मिठास और सौहार्द को दोबारा जीवित किया जा सकता है।
