जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सिंधु जलसंधि (Indus Water Treaty) समझौते के स्थगन पर बयान देते हुए कहा है कि इससे राज्य की मौजूदा जलविद्युत परियोजनाओं (Hydro Projects) पर तत्काल कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि समझौते के स्थगन से भविष्य में संभावित लाभ या प्रभाव हो सकते हैं, लेकिन फिलहाल राज्य की चल रही हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाएं नियमित रूप से संचालित हो रही हैं और उनके कार्यों में कोई व्यवधान नहीं आया है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस अवसर पर कश्मीरी पंडितों की वापसी पर भी अपनी सोच साझा की। उन्होंने कहा कि राज्य में पंडितों की सुरक्षित और स्थायी वापसी के लिए सुरक्षा और विश्वास बहाली, पुनर्वास पैकेज से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। उनका मानना है कि केवल वित्तीय या पुनर्वास उपाय ही पर्याप्त नहीं हैं; वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब पंडित समुदाय को सुरक्षा, सम्मान और भरोसा मिले।
इसके अलावा, उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर की मौजूदा चुनौतियों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि राज्य में आतंकी हमले और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं बड़ी समस्याएं हैं, जिनका प्रभाव आम जनता और विकास कार्यों पर गहरा पड़ता है। उन्होंने इन मुद्दों का समाधान करने के लिए सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक प्रयासों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
मुख्यमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि जलविद्युत परियोजनाओं और जलसंधि समझौते के मामलों में रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। उनका कहना है कि राज्य की ऊर्जा सुरक्षा और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स का सतत विकास प्राथमिकता है, और इस दिशा में किसी भी अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय निर्णय का समुचित विश्लेषण किया जाएगा।
इस बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि जम्मू-कश्मीर सरकार का फोकस न केवल जल संसाधनों और ऊर्जा उत्पादन पर है, बल्कि सामाजिक पुनर्वास, सुरक्षा और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने पर भी बराबर है।
