त्रिपुरा के एमबीए छात्र अंजेल चकमा की देहरादून में हुई हत्या के बाद देशभर में आक्रोश का माहौल है। यह मामला केवल एक छात्र की मौत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि नस्लीय टिप्पणी, कानून-व्यवस्था और पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अंजेल पर कथित तौर पर नस्लीय टिप्पणी का विरोध करने के बाद हमला किया गया था, जिसमें उसे चाकू मारा गया। गंभीर रूप से घायल अंजेल ने करीब 17 दिनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत से संघर्ष किया, लेकिन अंततः उसकी मौत हो गई।
अंजेल के परिवार का आरोप है कि हमले के बाद समय रहते मदद नहीं मिली। मृतक के चाचा ने कहा कि घटना के दौरान और बाद में कोई भी उसे बचाने नहीं आया और देहरादून पुलिस ने शुरुआती स्तर पर मामले को गंभीरता से नहीं लिया। परिवार का यह भी कहना है कि पुलिस ने पहले इस हमले को नस्लीय हिंसा मानने से इनकार कर दिया था, जिससे जांच में देरी हुई और आरोपियों को फायदा मिला।
घटना के बाद बढ़ते दबाव और विरोध प्रदर्शनों के बीच पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अब तक पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि एक आरोपी अभी फरार बताया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि मामले की गहन जांच की जा रही है और फरार आरोपी को भी जल्द गिरफ्तार किया जाएगा। वहीं, अंजेल की मौत के बाद छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने निष्पक्ष जांच और दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग की है।
यह घटना देश में पूर्वोत्तर के छात्रों की सुरक्षा और उनके साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को फिर से सामने ले आई है। अंजेल चकमा की हत्या ने न सिर्फ उसके परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है, बल्कि समाज और प्रशासन के सामने भी यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बाहर पढ़ने आए छात्रों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं या नहीं।
